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जानिए आशा दशमी कब मनाई जाती है, किस देवी को समर्पित है यह व्रत, क्या है इसका महत्व और पौराणिक कथा - Know when asha dashami is celebrated, to which goddess is this fast dedicated, what is its importance and mythology

जानिए आशा दशमी कब मनाई जाती है, किस देवी को समर्पित है यह व्रत, क्या है इसका महत्व और पौराणिक कथा – Know when asha dashami is celebrated, to which goddess is this fast dedicated, what is its importance and mythology

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आशा दशमी एक विशेष व्रत है, जो देवी पार्वती की आराधना को समर्पित होता है। संस्कृत शब्दों में आशा का अर्थ है इच्छा और दशमी का अर्थ है चंद्र पक्ष की दसवीं तिथि। यानी आशा दशमी वह दिन है, जब मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी से प्रार्थना की जाती है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

आशा दशमी व्रत प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 5 जुलाई 2025 को मनाया जाएगा। कुछ क्षेत्रों में इसे कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर भी मनाने की परंपरा है। यह पर्व गिरिजा पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है।

आशा दशमी का महत्व

यह व्रत विशेष रूप से वैवाहिक जीवन में सौहार्द, स्वास्थ्य, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। मान्यता है कि आशा दशमी व्रत करने से देवी पार्वती प्रसन्न होती हैं और श्रद्धालुओं की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

आशा दशमी व्रत कथा

प्राचीन काल में निषध देश में नल नामक राजा राज्य करते थे। उनके भाई पुष्कर ने जुए में उन्हें पराजित कर दिया, जिसके बाद राजा नल अपनी पत्नी दमयंती के साथ राज्य छोड़कर वनवास पर निकल गए। वे प्रतिदिन एक वन से दूसरे वन भटकते रहते और केवल जल ग्रहण कर जीवन व्यतीत करते। एक दिन राजा नल ने वन में सोने की चमक वाले पक्षियों को देखा और उन्हें पकड़ने की इच्छा से उनके ऊपर एक कपड़ा फेंका, लेकिन सभी पक्षी कपड़े को लेकर उड़ गए। इस घटना से नल इतने निराश हुए कि नींद में सो रही दमयंती को वहीं छोड़कर चले गए।

जब दमयंती की नींद खुली और उन्होंने नल को वहां नहीं पाया, तो वह जोर-जोर से रोने लगी और उन्हें खोजते हुए भटकने लगी। इस तरह कई दिन बीत गए और वह चेदी देश पहुंच गई, जहां वह फिर से विलाप करने लगी। उसकी दशा देखकर छोटे-छोटे बच्चे उसे आश्चर्य से घेरने लगे। उसी समय चेदी देश की राजमाता की नजर दमयंती पर पड़ी, जो चंद्रमा की रेखा के समान भूमि पर पड़ी हुई थी। राजमाता ने उसे अपने महल में बुलाया और पूछा कि वह कौन है। इस पर दमयंती ने संकोचपूर्वक कहा कि वह विवाहित स्त्री है, किसी के चरण नहीं धोती और न ही किसी का जूठा भोजन करती है। यदि कोई उसे प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो वह राजमाता द्वारा दंडनीय होगा। यह प्रतिज्ञा सुनकर राजमाता ने उसे महल में रहने की अनुमति दे दी।

कुछ समय बाद एक ब्राह्मण दमयंती को उसके माता-पिता के घर ले आया, लेकिन अपनों का स्नेह पाने के बावजूद वह पति के बिना अत्यंत दुखी रहती थी। एक दिन उसने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण से पूछा कि कोई ऐसा व्रत या उपाय बताएं जिससे उसका पति उसे पुनः मिल जाए। तब ब्राह्मण ने उसे आशा दशमी व्रत करने की सलाह दी। दमयंती ने श्रद्धा पूर्वक आशा दशमी व्रत का अनुष्ठान किया और इस व्रत के प्रभाव से उसे पुनः अपने पति नल की प्राप्ति हुई।

 

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